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Showing posts from May, 2018

आत्मसंवाद : एक गीत पृष्ठ / 7

मलय की न हवा आती जटा से गिरता न पानी। सूखती वह जा रही है शिव ! तुम्हारी राजधानी।

आत्मसंवाद : एक गीत पृष्ठ / 6

बेच  रहे  हैं  कहीं  भोग  वे  कहीं बेचते आसन - योग। जो  है   जिनके  पास   बेचते  बाजारों  में  खड़े  लोग।। गीतों का  बाजार  बड़ा है  सबके  अपने - अपने गीत। सब कुछ बिकता बाजारों में गीत, पीर हो या हो प्रीत।। गीत- भ्रूण को लिए पेट में चलती  कवियों की जमात। बाजार देखते  ही  कवियों का  होता  क्यों है गर्भपात ? बाजारों से डरना उन पर रोना भी क्या काव्य-कर्म  है? गीत बेचकर  अन्न ब्रह्म को पाना इसमें क्या विधर्म  है? बाजार जीभ पर  आते ही उन्हें ही  मितली क्यों आए ? सबकी है चांदी  उनको  ही  भौंरा - तितली क्यों भाए ? कबतक फुक् - फुक् पेट  बांधकर गा पाएंगे गायक ये? दान -दया पर कबतक शोभें  स्वाभिमान के नायक ये? बाजारों से भाग - भाग हम जाएं कहां - किधर गली में। कविता देखो  खोज रही, नियति  अपनी  मूंगफली  में।। पसरा  है   बाजार   तुम्हारे  घर  के  कोने  -...

आत्मसंवाद : एक गीत पृष्ठ / 5

सभी चल रहे आंख  मूंदकर उंगली  पकड़  इशारे की। उंगली जिसको करती इंगित खबर नही उस प्यारे की।। किस कुनबे की लंबी उंगली  किसकी कितनी छोटी है! असली है बस अपनी  समझो  शेष सभी  की खोटी है।। कुछ तो बहुत  पुरानी हैं, अब  तो उनको  काटो, फेंको। कहते हैं सब उंगली वाले  सिर्फ उन्ही  की चाटो, देखो।। धर्म  -ध्वजा  के  वाहक  हैं  ले उंगलियां   घूम  रहे  हैं। इंसानों  का  खून   बहाकर  वे उंगलियां   चूम  रहे  हैं।। अँगुलियों  की   माला  पहने  कई  अंगुलीमाल  घूमते। अपने  -अपने  अहंकार की   बेहोशी  में  खूब  झूमते।। देखो ,  कितना  कहर   मचाया   ईश्वर !  तेरे  बंदों  ने। अपने  हाथों   आग  लगाई   अपने   ही  घर अंधों  ने।। वेद-उपनिषद-गीता, धम्म, अवेस्ता,बाइबिल या कुरान । ये  हैं  अद्भुत उंगलियां  जो करे  इशारों...

आत्म- संवाद : एक गीत पृष्ठ / 4

उस दिन होगी मृत्यु गीत की जिस दिन होगा लय का अंत। कोयल  कब तक  गाएगी   यह तय करता है  सिर्फ़ वसंत।। टूट   अगर   लय  ही  जाएगा जीवन   होगा  छिन्न - भिन्न। मानव ही क्या जीव जंतु सब मन से  होंगे खिन्न - विछिन्न।। सो सकता  है गीत  मगर  वह  मर  सकता है  कभी नहीं। थक  सकता  है थोड़े  दिन  वह डर सकता है कभी नहीं । इस घनघोर उथल-पुथल में लय को अगर बचा लेंगे  हम। कोयल  मर  भी गयी अगर  कौवों से गीत गवा लेंगे  हम।। मगर  गीत  को  मरने  हम  ना  देंगे   इतनी  आसानी  से। बीज मुष्टि भर भी   काफी ,   उम्मीद है  मिट्टी - पानी  से।। मगर   बचाकर  रखना   होगा   लय  को  इस  जीवन में। फिक्र  गीत  की  नहीं  मुझे  मैं लय की  खातिर हूँ रण में।। इस  विराट्  रचना के भीतर  उठता सदा  महा-लय ...

आत्म-संवाद : एक गीत पृष्ठ / 3

रक्त  - दंत  क्यों   बार - बार हैं  उगते  रहते  जबड़ों में ? लाल  दाग  क्यों  पड़ते  हैं   पृथ्वी के  मैले   कपड़ों में ? शस्य -श्यामला  धरती पर  क्यों  रंगों का  संघर्ष  सदा ? मरु की  मृत  रेतों पर  दहता   हरियाली का हर्ष  सदा।। सघन छांव थी, बरगद की बाहें  कितनी,  हृदय विराट। लटक  जटाएं   शीश - मूल  की  दूरी  जैसे  रहीं  पाट।। सूख  रहा है  बरगद  भीतर,  पत्ते  झड़ बेजान पड़े हैंं । धूप - ठंढ  मेंं  सूखे - ठिठुरे ,  ठूँठ  बने  इंसान खड़े हैं।। ......................क्रमश:...

आत्म-संवाद : एक गीत पृष्ठ / 2

गोल गोल -सा धूम्र -वलय है उठता जाता आसमान में। नीचे  ठंडी  राख  पड़ी  है,   गहरे  भीतर  जले प्राण में।। कब पत्थर चल जाएं नाक पर, चलें गोलियां छाती पर। कब सर पे आ गोले फूटें ,  क्षुर  घुपें पीठ की पाटी पर।। बहुत  हुए  हैं  दावे  सबके  दुख  छू -  मन्तर  करने के। मरहम  लेकर आते  हैं  सब  जख्म   निरंतर  भरने के।। आम  आदमी  की  बदहाली  होती  है  क्या  दूर कभी ? भूखों को भी  भायेगा  क्या ?  बोलो तुलसी सूर कभी? अनगिन  गीतों - छंदों का  संसार हमेशा जीवित रहता। अगर हृदय में थोड़ा -सा भी प्यार हमेशा जीवित रहता।। कहते हैं  सब, कठिन समय है,  मानवता का प्रश्नकाल। शोर  संक्रमण  का  है  बढता जाता  जैसे   इंद्र - जाल।। कोई कहता शून्य - काल है , कोई कहता  मुखर  काल। सूरज के  रथ चढ़  आता  है  शायद  कोई  संधि -काल ।। कोई  क...

आत्म-संवाद : एक गीत पृष्ठ / 1

थी  अभिलाषा  मन में  मेरे  बरसों  से , एक गीत लिखूँ । अमिट रहे जो समय -शिला पर ऐसा ही एक गीत लिखूँ।। कुपित  काल  के  कोलाहल  में अन्तर्मन  से  नाद  उठे। गीतों  में  भी  बांध  सकूं  यदि  भीतर  से   संवाद  उठे।। बूंद  -  बूंद   में   गीत  घोल  दूं  कोई   ऐसी  लहर  उठे। जुग - जुग प्यासों के  जैसे कोटि-कोटि फिर अधर  उठे।। मन  के  कोमल  भावों  का  छोटा-सा  निर्झर  फूट पड़े। दृग  के  कोने -  कोने  धो  आंसू   बन   बाहर  छूट पड़े।। इस  आँसू  में  डुबो  गीत  कुछ पीड़ा का  उपचार करूं । सदियों  से  बोझिल अंतर  को कब  गाकर निर्भार करूँ ।। देख रहा हूँ , हर  पल  सबके  मन के  अंदर  का तनाव । सबके मुख -मंडल पर  पसरा वक्र- भाव-सा है खिंचाव।। अहंकार  के  बादल, ...