आत्मसंवाद : एक गीत पृष्ठ / 6
बेच रहे हैं कहीं भोग वे कहीं बेचते आसन - योग।
जो है जिनके पास बेचते बाजारों में खड़े लोग।।
गीतों का बाजार बड़ा है सबके अपने - अपने गीत।
सब कुछ बिकता बाजारों में गीत, पीर हो या हो प्रीत।।
गीत- भ्रूण को लिए पेट में चलती कवियों की जमात।
बाजार देखते ही कवियों का होता क्यों है गर्भपात ?
बाजारों से डरना उन पर रोना भी क्या काव्य-कर्म है?
गीत बेचकर अन्न ब्रह्म को पाना इसमें क्या विधर्म है?
बाजार जीभ पर आते ही उन्हें ही मितली क्यों आए ?
सबकी है चांदी उनको ही भौंरा - तितली क्यों भाए ?
कबतक फुक् - फुक् पेट बांधकर गा पाएंगे गायक ये?
दान -दया पर कबतक शोभें स्वाभिमान के नायक ये?
बाजारों से भाग - भाग हम जाएं कहां - किधर गली में।
कविता देखो खोज रही, नियति अपनी मूंगफली में।।
पसरा है बाजार तुम्हारे घर के कोने - कोने में।
लाभ, लोभ- लालच हैं पकते भीतर कहीं भगोने में।।
नैतिकता - आदर्श गायब है अगर हमारे आचरणों से।
शब्द आर्द्र फिर कैसे होंगे बोलो सूखे व्याकरणों से।।
शब्दों में हम हुए विरुद्ध, हाथों से प्रछन्न समर्थन है।
बिगड़ी लय से उठा हुआ यह कोई तांडव - नर्तन है।।
जो है जिनके पास बेचते बाजारों में खड़े लोग।।
गीतों का बाजार बड़ा है सबके अपने - अपने गीत।
सब कुछ बिकता बाजारों में गीत, पीर हो या हो प्रीत।।
गीत- भ्रूण को लिए पेट में चलती कवियों की जमात।
बाजार देखते ही कवियों का होता क्यों है गर्भपात ?
बाजारों से डरना उन पर रोना भी क्या काव्य-कर्म है?
गीत बेचकर अन्न ब्रह्म को पाना इसमें क्या विधर्म है?
बाजार जीभ पर आते ही उन्हें ही मितली क्यों आए ?
सबकी है चांदी उनको ही भौंरा - तितली क्यों भाए ?
कबतक फुक् - फुक् पेट बांधकर गा पाएंगे गायक ये?
दान -दया पर कबतक शोभें स्वाभिमान के नायक ये?
बाजारों से भाग - भाग हम जाएं कहां - किधर गली में।
कविता देखो खोज रही, नियति अपनी मूंगफली में।।
पसरा है बाजार तुम्हारे घर के कोने - कोने में।
लाभ, लोभ- लालच हैं पकते भीतर कहीं भगोने में।।
नैतिकता - आदर्श गायब है अगर हमारे आचरणों से।
शब्द आर्द्र फिर कैसे होंगे बोलो सूखे व्याकरणों से।।
शब्दों में हम हुए विरुद्ध, हाथों से प्रछन्न समर्थन है।
बिगड़ी लय से उठा हुआ यह कोई तांडव - नर्तन है।।
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