आत्म-संवाद : एक गीत पृष्ठ / 2


गोल गोल -सा धूम्र -वलय है उठता जाता आसमान में।
नीचे  ठंडी  राख  पड़ी  है,   गहरे  भीतर  जले प्राण में।।

कब पत्थर चल जाएं नाक पर, चलें गोलियां छाती पर।
कब सर पे आ गोले फूटें ,  क्षुर  घुपें पीठ की पाटी पर।।

बहुत  हुए  हैं  दावे  सबके  दुख  छू -  मन्तर  करने के।
मरहम  लेकर आते  हैं  सब  जख्म   निरंतर  भरने के।।

आम  आदमी  की  बदहाली  होती  है  क्या  दूर कभी ?
भूखों को भी  भायेगा  क्या ?  बोलो तुलसी सूर कभी?

अनगिन  गीतों - छंदों का  संसार हमेशा जीवित रहता।
अगर हृदय में थोड़ा -सा भी प्यार हमेशा जीवित रहता।।

कहते हैं  सब, कठिन समय है,  मानवता का प्रश्नकाल।
शोर  संक्रमण  का  है  बढता जाता  जैसे   इंद्र - जाल।।

कोई कहता शून्य - काल है , कोई कहता  मुखर  काल।
सूरज के  रथ चढ़  आता  है  शायद  कोई  संधि -काल ।।

कोई  कहता  मानवता की  होगी फिर से  कड़ी परीक्षा।
गीतों  में   ही   होनी  उसकी  तैयारी  की  बड़ी समीक्षा।।

कभी-कभी  आता है  मन में जग में जीवन क्यों आया ?
इतनी पीड़ा-ताप लिए फिर इसका हर क्षण क्यों आया ?

ऐसे  प्रश्नों   के  उत्तर  खुद  पाकर कुछ  तो   बुद्ध  हुए।
आभा उनकी  विदा हुई तब  बार- बार फिर   युद्ध  हुए।।










......................क्रमश:...



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