आत्म-संवाद : एक गीत पृष्ठ / 1


थी  अभिलाषा  मन में  मेरे  बरसों  से , एक गीत लिखूँ ।
अमिट रहे जो समय -शिला पर ऐसा ही एक गीत लिखूँ।।

कुपित  काल  के  कोलाहल  में अन्तर्मन  से  नाद  उठे।
गीतों  में  भी  बांध  सकूं  यदि  भीतर  से   संवाद  उठे।।

बूंद  -  बूंद   में   गीत  घोल  दूं  कोई   ऐसी  लहर  उठे।
जुग - जुग प्यासों के  जैसे कोटि-कोटि फिर अधर  उठे।।

मन  के  कोमल  भावों  का  छोटा-सा  निर्झर  फूट पड़े।
दृग  के  कोने -  कोने  धो  आंसू   बन   बाहर  छूट पड़े।।

इस  आँसू  में  डुबो  गीत  कुछ पीड़ा का  उपचार करूं ।
सदियों  से  बोझिल अंतर  को कब  गाकर निर्भार करूँ ।।

देख रहा हूँ , हर  पल  सबके  मन के  अंदर  का तनाव ।
सबके मुख -मंडल पर  पसरा वक्र- भाव-सा है खिंचाव।।

अहंकार  के  बादल,  मन  के  नभ  में ,  छाए  रहते  हैं।
आत्ममुग्धता    के   मयूर   भी  पंख   उठाए   रहते  हैं ।।

मनोविकारों  के  गुबार  तो  उठते  रहते  हैं  आठ  पहर।
मन-आतम के क्षितिज- रेख पर  कुहरा कोई रहा पसर।।

बेहोशी  का  आलम  है  यह,  आग  लगी  है  बस्ती  में।
झूम रहे  सब गाफिल होकर अपनी - अपनी  मस्ती  में।।

पैरों  के   नीचे   है  शायद    बिछी   बारुदी बड़ी  सुरंग।
उड़  जाएंगे   लोग  हवा  में  टुकडों  में  कब  जाएं टंग।।










......................क्रमश:...




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