आत्म-संवाद : एक गीत पृष्ठ / 3


रक्त  - दंत  क्यों   बार - बार हैं  उगते  रहते  जबड़ों में ?
लाल  दाग  क्यों  पड़ते  हैं   पृथ्वी के  मैले   कपड़ों में ?

शस्य -श्यामला  धरती पर  क्यों  रंगों का  संघर्ष  सदा ?
मरु की  मृत  रेतों पर  दहता   हरियाली का हर्ष  सदा।।

सघन छांव थी, बरगद की बाहें  कितनी,  हृदय विराट।
लटक  जटाएं   शीश - मूल  की  दूरी  जैसे  रहीं  पाट।।

सूख  रहा है  बरगद  भीतर,  पत्ते  झड़ बेजान पड़े हैंं ।
धूप - ठंढ  मेंं  सूखे - ठिठुरे ,  ठूँठ  बने  इंसान खड़े हैं।।










......................क्रमश:...


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