आत्म- संवाद : एक गीत पृष्ठ / 4
उस दिन होगी मृत्यु गीत की जिस दिन होगा लय का अंत।
कोयल कब तक गाएगी यह तय करता है सिर्फ़ वसंत।।
टूट अगर लय ही जाएगा जीवन होगा छिन्न - भिन्न।
मानव ही क्या जीव जंतु सब मन से होंगे खिन्न - विछिन्न।।
सो सकता है गीत मगर वह मर सकता है कभी नहीं।
थक सकता है थोड़े दिन वह डर सकता है कभी नहीं ।
इस घनघोर उथल-पुथल में लय को अगर बचा लेंगे हम।
कोयल मर भी गयी अगर कौवों से गीत गवा लेंगे हम।।
मगर गीत को मरने हम ना देंगे इतनी आसानी से।
बीज मुष्टि भर भी काफी , उम्मीद है मिट्टी - पानी से।।
मगर बचाकर रखना होगा लय को इस जीवन में।
फिक्र गीत की नहीं मुझे मैं लय की खातिर हूँ रण में।।
इस विराट् रचना के भीतर उठता सदा महा-लय एक।
उससे अपनी कणिका का , लय ना टूटे कभी, देख।।
गीत अगर तुम गा न सके , मृत्यु गीत की कर दी घोषित।
मरता होगा गीत तुम्हारा, इस रचना का गीत है जीवित ।।
इस विराट रचना में तोलो कितना तेरा हिस्सा है।
तेरे गूंगे - बहरेपन से खत्म न होता किस्सा है।।
15/05/2018
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