सभी चल रहे आंख मूंदकर उंगली पकड़ इशारे की। उंगली जिसको करती इंगित खबर नही उस प्यारे की।। किस कुनबे की लंबी उंगली किसकी कितनी छोटी है! असली है बस अपनी समझो शेष सभी की खोटी है।। कुछ तो बहुत पुरानी हैं, अब तो उनको काटो, फेंको। कहते हैं सब उंगली वाले सिर्फ उन्ही की चाटो, देखो।। धर्म -ध्वजा के वाहक हैं ले उंगलियां घूम रहे हैं। इंसानों का खून बहाकर वे उंगलियां चूम रहे हैं।। अँगुलियों की माला पहने कई अंगुलीमाल घूमते। अपने -अपने अहंकार की बेहोशी में खूब झूमते।। देखो , कितना कहर मचाया ईश्वर ! तेरे बंदों ने। अपने हाथों आग लगाई अपने ही घर अंधों ने।। वेद-उपनिषद-गीता, धम्म, अवेस्ता,बाइबिल या कुरान । ये हैं अद्भुत उंगलियां जो करे इशारों...
रक्त - दंत क्यों बार - बार हैं उगते रहते जबड़ों में ? लाल दाग क्यों पड़ते हैं पृथ्वी के मैले कपड़ों में ? शस्य -श्यामला धरती पर क्यों रंगों का संघर्ष सदा ? मरु की मृत रेतों पर दहता हरियाली का हर्ष सदा।। सघन छांव थी, बरगद की बाहें कितनी, हृदय विराट। लटक जटाएं शीश - मूल की दूरी जैसे रहीं पाट।। सूख रहा है बरगद भीतर, पत्ते झड़ बेजान पड़े हैंं । धूप - ठंढ मेंं सूखे - ठिठुरे , ठूँठ बने इंसान खड़े हैं।। ......................क्रमश:...
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