सभी चल रहे आंख मूंदकर उंगली पकड़ इशारे की। उंगली जिसको करती इंगित खबर नही उस प्यारे की।। किस कुनबे की लंबी उंगली किसकी कितनी छोटी है! असली है बस अपनी समझो शेष सभी की खोटी है।। कुछ तो बहुत पुरानी हैं, अब तो उनको काटो, फेंको। कहते हैं सब उंगली वाले सिर्फ उन्ही की चाटो, देखो।। धर्म -ध्वजा के वाहक हैं ले उंगलियां घूम रहे हैं। इंसानों का खून बहाकर वे उंगलियां चूम रहे हैं।। अँगुलियों की माला पहने कई अंगुलीमाल घूमते। अपने -अपने अहंकार की बेहोशी में खूब झूमते।। देखो , कितना कहर मचाया ईश्वर ! तेरे बंदों ने। अपने हाथों आग लगाई अपने ही घर अंधों ने।। वेद-उपनिषद-गीता, धम्म, अवेस्ता,बाइबिल या कुरान । ये हैं अद्भुत उंगलियां जो करे इशारों...
उस दिन होगी मृत्यु गीत की जिस दिन होगा लय का अंत। कोयल कब तक गाएगी यह तय करता है सिर्फ़ वसंत।। टूट अगर लय ही जाएगा जीवन होगा छिन्न - भिन्न। मानव ही क्या जीव जंतु सब मन से होंगे खिन्न - विछिन्न।। सो सकता है गीत मगर वह मर सकता है कभी नहीं। थक सकता है थोड़े दिन वह डर सकता है कभी नहीं । इस घनघोर उथल-पुथल में लय को अगर बचा लेंगे हम। कोयल मर भी गयी अगर कौवों से गीत गवा लेंगे हम।। मगर गीत को मरने हम ना देंगे इतनी आसानी से। बीज मुष्टि भर भी काफी , उम्मीद है मिट्टी - पानी से।। मगर बचाकर रखना होगा लय को इस जीवन में। फिक्र गीत की नहीं मुझे मैं लय की खातिर हूँ रण में।। इस विराट् रचना के भीतर उठता सदा महा-लय ...
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